If Minerals Of Jharkhand Are Sold Like This, There Won’t Be Anything Left For Next Generation: Rahul Basu (हिन्‍दी अनुवाद सहित)

:: न्‍यूज मेल डेस्‍क ::

Ranchi: Rahul Basu, Research Director at Goa Foundation, gave a public lecture on the topic Jharkhand's minerals is our Jaydaad: how can we protect our family good? at Xavier Institute of Social Service, Ranchi on Thursday. “State government is not someone who owns the minerals but it is custodian of the minerals which needs to be passed on to the next generation. Citizens also need to understand that if you sell all the minerals then what they will give to their future generations,” said Rahul while empathetically appealing to people of Jharkhand to start talking about the loot of their minerals. Rahul Basu has been advocating for treating minerals as intergenerational equity and fighting for Goans to have the share of iron ore mining since the resources belong to the citizens.

“Mining is the sale of the family gold. All over the world, politicians and miners collaborate to extract and sell the inherited minerals for peanuts, which are then consumed. We are becoming poorer. This is unsustainable,” Rahul further explained. 

Giving an example of Goa, he explained how the state lost 95% of the revenue from iron ore mining over 8 years(2004-2012), incurring a loss of over Rs 50,000 crore. If the revenue from the mineral was put in an endowment fund, attracting an interest of 3% percent adjusting the inflation and other costs, every citizen of Goa would have been getting Rs 1000 per month. But now that money is gone benefiting a very few people. 

To address the problem of plundering of minerals, Rahul proposed a solution: Minerals are a Shared Inheritance - 5 principles
1. Natural resources are a commons, owned by the state as trustee for the people and esp. future generations (Public Trust Doctrine)
2. Minerals are inherited assets and we are simply custodians for future generations (Intergenerational Equity Principle)
Consider inherited gold. If we keep it safe, our children can inherit the gold. If we sell gold to purchase land (which provides income), we must ensure we get the full value, and invest everything in land. If there’s income after maintaining the land, we can consume it. Our children will inherit the land and benefit from the income in turn. Intergenerational equity. By extension:
3. If we mine, we must ensure Zero loss – we must get the full value of mineral (sale price minus extraction expenses and a reasonable return on capital for the miner)
4. All mineral receipts saved in a Permanent Fund (endowment fund), a part of the commons.
5. We own the minerals, the fund and its income. Any real income (after reinvesting for inflation) be distributed only as a Citizens’ Dividend, a right of ownership.

The public lecture was attended by Jean Dreze, an economist and visiting professor at Ranchi university, who appreciated the ideas presented by Rahul and said that seeing minerals as intergenerational equity will at least slow down the way resources like coals and bauxite are being plundered in the state. 

Rahul gave examples of Norway and Alaska, where in certain form the concept of intergenerational equity has been put in place benefiting the citizens. Currently, Norway, a country with a population of 5 million people, is sitting on an intergenerational fund of over 1.4 trillion dollars created from selling the north-sea oil which is double the forex reserve of India.

The audience welcomed the ideas shared by Rahul Basu and believed a movement is needed in the state so that the minerals are treated as a shared inheritance rather than a way to earn revenue. 

 

हिन्‍दी अनुवाद: 

यदि झारखंड के खनिज को इस तरह से बेचा जाएगा, तो अगली पीढ़ी के लिए कुछ नहीं बचेगा: राहुल बसु

खनिजों को पारिवारिक संपदा (जायदाद) के रूप में देखना शुरू करें, राजस्व के रूप में नहीं: राहुल बसु प्रतिमान बदलाव के लिए कॉल/अपील

रांची, भारत, गुरुवार, 09 सितंबर, 2021: गोवा फाउंडेशन के शोध निदेशक राहुल बसु ने गुरुवार को रांची के जेवियर इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल सर्विस में ‘झारखंड के खनिज हमारे जायदाद हैं: हम अपने परिवार की भलाई की रक्षा कैसे कर सकते हैं’ विषय पर एक सार्वजनिक व्याख्यान दिया। “राज्य सरकार खनिजों का मालिक नहीं है, सरकारें खनिजों का संरक्षक है और उसकी जिम्मेदारी है वे इसे अगली पीढ़ी के लिए संरक्षित रखे। नागरिकों को यह भी समझने की जरूरत है कि अगर वे सभी खनिजों को बेच देंगे, तो वे अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए क्या छोड़ कर जाएंगे”, राहुल ने झारखंड के लोगों से सहानुभूतिपूर्वक अपील करते हुए कहा कि वे अपने खनिजों की लूट के बारे में बात करना शुरू करें। राहुल बसु खनिजों को ‘अंतरपीढ़ीगत इक्विटी’ मानने की वकालत करते रहें हैं और गोवावासिओं के लिए लौह अयस्क खनन में उनकी हिस्सेदारी के लिए लड़ते रहे हैं क्योंकि प्रकृतिक संसाधन नागरिकों की सम्पत्ति हैं।

"खनिजों का खनन परिवार के सोने की बिक्री है। पूरी दुनिया में, राजनेता और खनिक आपसी सांठगाँठ से विरासत में मिले खनिजों का खनन करते हैं और उसे मूंगफली के भाव पर बेच देते हैं। हम गरीब होते जा रहे हैं और यह अधारणीयअधर्निय है”, राहुल ने आगे कहा।

गोवा का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि कैसे राज्य को 8 वर्षों (2004-2012) में लौह अयस्क के खनन से 95% (50,000 करोड़ रुपये से अधिक) के राजस्व का नुकसान हुआ। यदि खनिज से प्राप्त राजस्व को एक बंदोबस्ती कोष में रखा गया होता, और मुद्रास्फीति और अन्य लागतों को समायोजित करने के बाद उस पर 3% ब्याज मिलता, तो गोवा के प्रत्येक नागरिक को प्रति माह 1000 रुपये मिल रहे होते। लेकिन अब वह पैसा केवल मुट्ठी भर लोगों को फायदा पहुंचा रहा है।

खनिजों की लूट की समस्या को दूर करने के लिए, राहुल ने एक समाधान का प्रस्ताव किया: खनिज एक साझा विरासत है – 5 सिद्धांत

1.      प्राकृतिक संसाधन एक कॉमन्स हैं, जो राज्य के स्वामित्व में है और राज्य नागरिकों और खासकर भविष्य की पीढ़ी के लिए ट्रस्टी के रूप में हैं (सार्वजनिक न्यास सिद्धांत)

2.      खनिज विरासत में मिली संपत्ति हैं और हम भविष्य की पीढ़ियों के लिए बस संरक्षक हैं (इंटरजेनरेशनल इक्विटी सिद्धांत)

विरासत में मिले सोने पर विचार करें। अगर हम इसे सुरक्षित रखें तो हमारे बच्चे सोने के वारिस हो सकते हैं। यदि हम भूमि खरीदने के लिए सोना बेचते हैं (जो आय प्रदान करता है), तो हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हमें पूरा मूल्य मिले, और भूमि में सब कुछ निवेश करें। यदि भूमि को बनाए रखने के बाद कोई आय है, तो हम इसका उपभोग कर सकते हैं। हमारे बच्चे भूमि के वारिस होंगे और बदले में आय से लाभ होगा। यह अंतरपीढ़ीगत इक्विटी है।

3.      यदि हम खनन करते हैं, तो हमें शून्य हानि सुनिश्चित करनी चाहिए - हमें खनिज का पूरा मूल्य प्राप्त करना चाहिए (बिक्री मूल्य शून्य निकासी व्यय और खान के लिए पूंजी पर उचित वापसी)

4.      सभी खनिज प्राप्तियों को स्थायी निधि (एंडोमेंट फंड) में सहेजा जाय, जो कॉमन्स का एक हिस्सा है।

5.      हम खनिजों, निधि और उसकी आय के मालिक हैं। किसी भी वास्तविक आय (मुद्रास्फीति के लिए पुनर्निवेश के बाद) केवल एक नागरिक लाभांश, स्वामित्व का अधिकार के रूप में वितरित किया जाना चाहिए।

इस सार्वजनिक व्याख्यान में अर्थशास्त्री और रांची विश्वविद्यालय के विजिटिंग प्रोफेसर जीन ड्रेज ने राहुल द्वारा प्रस्तुत विचारों की सराहना करते हुए कहा कि खनिजों को अंतरपीढ़ीगत समानता के रूप में देखने से राज्य में बॉक्साइट और कोयला जैसे संसाधनों को लुटने के तरीके कम से कम हो जाएंगे।

राहुल ने नॉर्वे और अलास्का के उदाहरण दिए, जहां कुछ खास रूप में नागरिकों को लाभ पहुंचाने के लिए अंतरपीढ़ीगत इक्विटी की अवधारणा को लागू किया गया है। वर्तमान में, 50 लाख की आबादी वाले देश नॉर्वे के पास

1.4 ट्रिलियन डॉलर से अधिक की अंतरपीढ़ीगत निधि है जिसकी कमाई उन्हें उत्तर-समुद्र के तेल की बिक्री से मिली है जो भारत के विदेशी मुद्रा भंडार से दोगुना है।

दर्शकों ने राहुल बसु द्वारा साझा किए गए विचारों का स्वागत किया और माना कि राज्य में एक आंदोलन की जरूरत है ताकि खनिजों को राजस्व अर्जित करने के तरीके के बजाय साझा विरासत के रूप में माना जा सके।

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