स्‍टेन स्‍वामी रांची से गिरफ्तार, भीमा कोरेगांव मामले में एनआईए की कार्रवाई

:: न्‍यूज मेल डेस्‍क ::

रांची: भीमा कोरेगांव मामले में झारखंड के मानवाधिकार कार्यकर्त्‍ता फादर स्‍टेन स्‍वामी को एनआईए की टीम ने गुरूवार , 08 अक्‍टूबर 2020, को गिरफ्तार कर लिया है। यह गिरफ्तारी शाम साढ़े सात बजे उनके रांची के नामकोम स्थित बगईचा परिसर के आवास से की गई। स्‍टेन बार बार एनआईए की टीम से अनुरोध करते रहे कि उन्‍हें सुबह तक का मोहलत दें। उनकी तबियत ठीक नहीं है। दरअसल 83 वर्षीय स्‍टेन स्‍वामी पिछले कुछ समय से कैंसर से भी पीडि़त रहे हैं। गिरफ्तारी के वक्‍त मौजूद अपने संगियों के मार्फत स्‍टेन ने एक पत्र जनता के नाम जारी करते हुए न्‍याय की गुहार लगायी है। दो पन्‍नों के इस पत्र की हुबहु प्रति यहां प्रस्‍तुत है: 
गिरफ्तारी के वक्‍त स्‍टेन स्‍वामी का बयान: 
मुझसे NIA ने पांच दिनों (27-30 जुताई व 6 अगस्त) में कुल 15 घंटे पूछताछ की. मेरे समक्ष उन्होंने मेरे बायोडेटा और कुछ तथ्यात्‍मक जानकारी के अलावा अनेक दस्तावेज़ व जानकारी रखी जो 'कथित तौर' पर मेरे कंप्यूटर से मिली एवं कथित तौर पर माओवादियों के साथ मेरे जुड़ाव का खुलासा करते है. मेंने उन्हें स्पष्ट कहा कि ये छल-रचना है एवं ऐसी दस्तावेज़ और जानकारी चोरी से मेरे कंप्यूटर में डाले गए है और इन्हें में अस्वीकृत करता हूँ।

NIA की वर्तमान अनुसन्धान का भीमा कोरेगांव मामले में मुझे संदिग्ध आरोपी बोला गया है और मेरे निवास पर दो बार छापा (28 अगस्त 2018 व 12 जून 2019) मारा गया था, से कुछ लेना देना नहीं है लेकिन अनुसन्धान का मूल उद्देश्य है निम्न बातों को स्थापित करना-
 1) में व्यक्तिगत रूप से माओवादी संगठनों से जुड़ा हुआ हूँ एवं 2) मेरे माध्यम से बगईचा भी माओवादियों के साथ जुड़ा हुआ है. मैंने स्पष्ट रूप से इन दोनों आरोपों का खंडन किया. छः सप्ताह चुप्पी के बाद, NIA ने मुझे उनके मुंबई कार्यालय में हाजिर होने बोला है.

मैंने उन्हें सूचित किया है कि 1) मेरी समझ के परे है कि 15 घंटे पूछताछ करने के बाद भी मुझसे और पूछताछ करने की क्या आवश्यकता है, 2) मेरी उम्र (83 वर्ष) व देश में कोरोना महामारी को देखते मेरे लिए इतनी लम्बी यात्रा संभव नहीं है. झारखंड सरकार के कोरोना सम्बंधित अधिसूचना अनुसार 60 वर्ष से अधिक उम्र के बुजुर्ग व्यक्तियों को लॉकडाउन के दोरान नहीं निकलना चाहिए एवं 3) अगर NIA मुझसे और पूछताछ करना चाहती है, तो वो विडियो कांफ्रेंस के माध्यम से हो सकता है।

अगर NIA मेरे निवेदन को मानने से इंकार करे और मुझे मुंबई जाने के लिए जोर दें, तो मैं उन्हें कहूँगा कि उक्त कारणों से मेरे लिए जाना संभव नहीं है. आशा है कि उनमें मानवीय बोध हो. अगर नहीं, तो मुझे व हम सबको इसका नतीज़ा भुगतने के लिए तैयार रहना है।

इतने सालों से जो संघर्ष में मेरे साथ खड़े रहे हैं, में उनका आभारी हूँ.

लम्बे अरसे से में जिन सवालों को उठाते आया हूँ, उन पर एक नोट संलग्न है - क्या अपराध किया है मेंने ?

- स्टेन स्वामी

'जीवन और मृत्यु एक है, जैसे नदी और समुन्दर एक है' -कवि खलील जिब्रान

स्‍टेन स्‍वामी के कार्यकलाप उनके ही शब्‍दों में: क्या अपराध किया है मैंने?

पिछले तीन दशकों में में आदिवासियों और उनके आत्म सम्मान और सम्मानपूर्वक जीवन के अधिकार के संघर्ष के साथ अपने आप को जोड़ने और उनका साथ देने का कोशिश किया हूँ एक तेखक के रूप में में उनके विभिन्न मुद्दों का आकलन करने का कोशिश किया है इस दौरान में केंद्र व राज्य सरकारों की कई आदिवासी विरोधी और जन-विरोधी नीतियों के विरुद्ध अपनी असहमति लोकतान्त्रिक रूप से जाहिर किया हूँ मैंने सरकार और सत्तारूढी व्यवस्था के ऐसे अनेक नीतियों के नैतिक, औचित्य व कानूनी वैधता पर सवाल किया है.

1. मैंने संविधान के पांचवी अनुसूची के गैर-कार्यान्वयन पर सवाल किया है यह अनुसूची (अनुच्छेद 244 (क) भारतीय संविधान स्पष्ट कहता है कि राज्य में एक आदिवासी सलाहकार परिषद का गठन होना है जिसमें केवल

आदिवासी रहेंगे एवं समिति राज्यपाल को आदिवासियों के विकास एवं संरक्षण सम्बंधित सलाह देगी 2 मैने पुछा है कि क्यों पेसा कानून को पूर्ण रूप से दरकिनार कर दिया गया है. 1996 में बना पेसा कानून ने पहली बार इस बात को माना कि देश के आदिवासी समुदायों की ग्राम सभाओं के माध्यम से स्वशासन की अपनी

सत्र सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास है.

3 सर्वोच्च न्यायालय के 1997 के समता निर्णय पर सरकार की चुप्पी पर मैंने अपनी निराशा लगातार जताई है यह निर्णय [Civil Appeal Nos.4601-2 of 1997) का उद्देश्य था आदिवासियों को उनकी ज़मीन पर हो रहे

खनन पर नियंत्रण का अधिकार देना एवं उनकी आर्थिक विकास में सहयोग करना 4 2006 में बने वन अधिकार कानून को लागू करने में सरकार के उदासीन रवैया पर मेंने लगातार अपना दुःख व्यक्त किया है इस कानून का उदेश्य है आदिवासियों और वन-आधारित समुदायों के साथ सदियों से हो

रहे अन्याय को सुधारना 5. मैंने पूछा है कि क्यों सरकार सर्वोच्च न्यायालय के फेसले जिसकी जमीन, उसका खनीज - को लागू करने में इच्छुक नहीं है ।5C: Civil Appeal No 4549 of 2000 एवं लगातार विना ज़मीन मालिकों के हिस्से के विषय में सोचे कोयला ब्लाक का नीलामी कर कंपनियों को दे रही है.

भूमि अधिग्रहण कानून, 2013 में झारखंड सरकार के 2017 के संशोधन के औचित्य पर मेंने सवाल किया है यह संशोधन आदिवासी समुदायों के लिए विनाश का हथियार है इस संशोधन के माध्यम से सरकार ने सामाजिक प्रभाव आकलन की अनिवार्यता को समाप्त कर दी एवं कृषि व बहुफसलिया भूमि का गेर-कृषि इस्तेमाल के लिए दरवाजा खोल दिया

7 सरकार द्वारा तेंड बैंक स्थापित करने के विरुद्ध मैंने कड़े शब्दों में विरोध किया है लैंड बैंक आदिवासियों को समाप्त करने की एक और कोशिश है क्योंकि इसके अनुसार गाँव की गैर-मजरुआ (सामुदायिक भूमि) जमीन सरकार की है और न कि ग्राम सभा की एवं सरकार अपनी इच्छा अनुसार यह ज़मीन किसी को भी (मूलतः कंपनियों को) को दे सकती है

४ हजारो आदिवासी-मूलवासियों, जो भूमि अधिग्रहण और विस्थापन के अन्याय के विरुद्ध सवात करते हैं. को नक्सल होने के आरोप में गिरफ्तार करने का मैंने विरोध किया है मेने उच्च न्यायालय में झारखंड राज्य के विरुद्ध दर्ज कर मांग की है कि 1) सभी विचारधीन कैदियों को निजी बांड पर बेल में रिहा किया जाए. 2) अदालत मुकदमा में तीव्रता लायी जाए क्योंकि अधिकांश विचारधीन कैदी इस फर्जी आरोप से बरी हो जाएंगे. 3) इस मामले में लम्बे समय से अदालती मुकदमे की प्रक्रिया को लंबित रखने के कारणों के जाँच के लिए न्याधिक आयोग का गठन हो, 4) पुलिस विचारधीन कैदियों के विषय में मोंगी मयी पूरी जानकारी PIL के याचिकाकर्ता को इस मामले को दायर किए हुए दो साल से भी ज्यादा हो गया है लेकिन अभी तक पुलिस ने विचारधीन कैदियों के विषय में पूरी जानकारी नहीं दी है मैं मानता हूँ कि यही कारण है कि शाषण व्यवस्था मुझे रास्ते से हटाना चाहती है, और हटाने का सबसे आसान तरीका है कि मुझे फ़्जी मामलों में गंभीर आरोपों में फंसा दिया जाए और साथ ही, बेकसूर आदिवासियों को न्याय मिलने के न्यायिक प्रक्रिया को रोक दिया जाए.

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