बिहार में बवाल है; फिर नीतीशे कुमार है!

Approved by Srinivas on Wed, 08/10/2022 - 19:37

:: श्रीनिवास ::

ताजा घटनाक्रम के बाद बिहार और केंद्र की राजनीति, भावी नये समीकरणों को लेकर तरह तरह के कयास लगाये जाने लगे हैं. जदयू के वजूद  पर भी सवाल उठने लगा. यह आशंका व्यक्त की जा रही है कि उसके कुछ लोग भाजपा में, कुछ राजद में चले जायेंगे. यानी जेडीयू में अब बचा ही क्या है? मगर सवाल तो यह भी मौजूं है कि जेडीयू था ही क्या? नीतीश कुमार को केंद्र में रख कर लालू विरोधी या कहें, सामाजिक न्याय विरोधी और संकीर्ण हिंदुत्ववादी ताकतों का जमावड़ा.

वैसे नब्बे के दशक में जब आरक्षण पर बवाल हुआ, तब नीतीश कुमार भी बिहार की सामजिक न्याय की धारा में शामिल थे, लालू प्रसाद के साथ थे.  उनसे मतभेद हुआ. अलग होकर अकेले दम पर मुकाबला किया. तब सेकुलर धारा के; और  लालू प्रसाद से निराश अनेक लोगों ने उनका साथ दिया.  विफल रहे. 

लेकिन तब तक लालू प्रसाद के व्यक्तिवाद/ परिवारवाद और उस सरकार में अपराध के बेकाबू होने या खास जाति के लफंगों को छूट मिलने से गैर-यादव पिछड़े दूर होने लगे थे. नीतीश कुमार की अपनी बिरादरी के संख्या बल और अपना मुख्यमंत्री होने के गौरव के साथ; लालू विरोधी या सामाजिक न्याय या सीधे कहें तो आरक्षण  विरोधी  सवर्ण जुड़ गये. फिर नीतीश जी की महत्वाकांक्षा को भाजपा ने हवा दी, वे भाजपा के साथ हो लिये. सत्ता में आये और खुद को सक्षम  विकल्प साबित किया.   

हालांकि उन्होंने कभी सेकुलर होने का दावा नहीं छोड़ा. और उनके पक्ष में इतना कहा जा सकता है कि भाजपा के साथ होने की मजबूरी में जो भी समझौते किये हों, उन्होंने कभी भाजपा और संघ को उतनी छूट नहीं दी, जो इन संगठनों को भाजपा शासित अन्य राज्यों में मिली हुई है.  

नीतीश कुमार एरोगेंट हैं. व्यक्तिवादी हैं, शायद लालू प्रसाद से भी अधिक. आलोचना को सहजता से नहीं ले पाते. फिर भी बोलते हुए एक सीमा से अधिक फूहड़ नहीं हो पाते. कुल मिला कर शिक्षित, शालीन और राज्य के विकास के लिए काम करनेवाले की छवि बनी हुई है.

यह भी उल्लेखनीय है कि बिहार में सामाजिक न्याय और सेकुलरिज्म की  मजबूत धारा (कथित पिछड़ी जातियों की जागृत चेतना और एकजुटता, जिसका एक हद तक श्रेय लालू प्रसाद को भी जाता है) के कारण ही आज तक भाजपा मुख्यमंत्री पद के लिए वहां कोई सवर्ण विकल्प नहीं खोज या खड़ा कर पायी. लालू की काट में भी उसे किसी 'पिछड़े'को ही आगे रखना पड़ा.

अब अचानक स्थिति बदल गयी है. अब तक भाजपा जदयू की सहयोगी पार्टी थी. लेकिन अब वह मुख्य विपक्ष  की भूमिका में आ गयी है. तो अब बिहार में भी अब दो प्रमुख राजनीतिक धाराओं का सीधा मुकाबला होगा. यह एक तरह से अच्छा ही है. लेकिन सामाजिक न्याय के कथित समर्थकों का जो अंदाज रहा है, उसे देखते हुए कहा जा सकता है, उनका किसी सिद्धांत से लेना देना नहीं है. ‘अपना’ नेता जिधर जायेगा, हम आंख मूंद कर उधर रहेंगे. इसे जातिवाद कहना कहीं से गलत नहीं होगा. तब भाजपा के साथ होने के लिए भी तर्क ढूंढ़ लिया जायेगा, हां, अब तक (1990 के बाद) लालू प्रसाद या राजद ने   भाजपा से कोई समझौता नहीं किया है. लेकिन यदि कल वे ऐसा करें, तब भी उनके समर्थक उनके साथ ही रहेंगे, यह लगभग तय है. फिर भी सांप्रदायिकता विरोधी जमातों के लिए यह बदलाव फिलहाल तो एक राहत के सामान है ही. बशर्ते कि राजद नीतीश कुमार के साथ मजबूती से खड़ा रहे. सरकार बनाने में अपने समर्थन की बेजा कीमत वसूलने की कोशिश न करे.

यहां यह दर्ज कर देना आवश्यक है कि राजद और जदयू (लालू प्रसाद और नीतीश कुमार) के समर्थन का आधार जातीय गोलबंदी मान लेने का मतलब यह नहीं है कि अन्य  दल और उनके समर्थक जातिवाद से परे हैं. बल्कि लालू विरोध का आधार ही मुख्यतः यही रहा है.

फिलहाल भाजपा भले ही लूजर दिख रही है, लेकिन अब वह अकेले दम पर सत्ता में आने की तैयारी करेगी. उसे  दूसरे के कंधे पर बंदूक रख कर चलाने की और किसी तरह सत्ता में बने रहने के लिए अपनी कथित विचारधारा और एजेंडे को स्थगित रखने की लाचारी नहीं रहेगी. वह पूरी ताकत से और खुल कर अपने सारे कार्ड खेलेगी.

और कल क्या होगा, कौन जानता है? अभी बहुत उथल-पुथल होगी. दलबदल और ह्रदय परिवर्तन का खेल होगा.  साम-दाम- दंड-भेद सब आजमाया जायेगा. ‘ईडी’ सहित अन्य एजेंसियों को भी नये  ‘प्रोजेक्ट’ मिल ही सकते हैं. फिर आज जो लोग नीतीश कुमार के साथ दिख रहे हैं, वे कितने मन से और कब तक साथ रहेंगे, कौन कह सकता है. राजद कब तक सेकेंड पार्टनर बन कर रह सकेगा, क्या पता.  वैसे भी नीतीश कुमार मुख्यमंत्री भले बने हुए हैं, मगर आज उनमें वह आभा नहीं है. लोकतंत्र संख्या का भी खेल है; और इस मामले में उनकी स्थिति कमजोर है. अब उनकी पालकी  राजद ढोयेगा. पर कब तक और किन शर्तों पर? 

आनेवाले दिनों में बिहार राजनीतिक हलचल का केंद्र रहेगा. फिलहाल इंतजार करें. 2024 के आम चुनाव के लिहाज से भी बिहार एक महत्वपूर्ण रणक्षेत्र बनेगा. आगे जो भी हो, बिहार में बहार हो न हो, फिर भी—अब तक नीतीशे कुमार है.  

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