अधिक संभावना है कि सिद्धारमैया को कर्नाटक का अगला मुख्‍यमंत्री घोषित किया जाए, डीके शिवकुमार को भी सशक्‍त भूमिका सौंपने पर मंथन जारी

Approved by admin on Mon, 05/15/2023 - 22:43

:: न्‍यूज मेल डेस्‍क ::

नई दिल्ली: 14 मई को कर्नाटक विधायक दल की बैठक ने तय कर दिया था कि सिद्धादमैया और शिवकुमार में से चुनने की जिम्‍मवारी आलाकमान निभायें। इसके बाद 15 मई की सुबह से ही कयास लगाये जाने लगे कि 75 वर्षीय सिद्धारमैया ही कर्नाटक के अगले मुख्यमंत्री होंगे। यह बातें एक गुप्‍त मतदान से उभर रही हैं। 
पलड़ा अपने पक्ष से ऊपर जाता देख डी के शिवकुमार ने मीडिया में अपनी शिकायत दर्ज करा दी। कहा, कहा कि जब कांग्रेस-जनता दल (सेक्युलर) गठबंधन सरकार 2019 में 17 विधायकों के दलबदल के कारण गिर गई, तो सोनिया गांधी ने उन्हें पार्टी की राज्य इकाई का नेतृत्व संभालने का जिम्मा सौंपा था, और उन्‍होंने बिना हिम्मत हारे कमर कस ली थी। उसी समय से उनका लक्ष्‍य था पार्टी को सुरक्षित स्‍तर तक पहुंचाना।
हालाँकि, एआईसीसी न केवल सिद्धारमैया के पक्ष में इसलिये निर्णय ले रही है कि अधिकांश कांग्रेसी विधायकों के बीच उनकी लोकप्रियता अधिक है, बल्कि इसलिए भी कि उन्हें राज्य में व्यापक रूप से एक बड़े नेता के रूप में माना जाता है। अधिकांश चुनावी सर्वेक्षणों ने बताया कि अधिकांश लोगों का मानना है कि सिद्धारमैया मुख्यमंत्री पद के लिए आदर्श उम्मीदवार हैं। लोकनीति सीएसडीएस सर्वेक्षण में उन्‍हें सर्वोत्‍तम मुख्‍यमंत्री के तौर पर 40 फीसदी लोगों ने पसंद किया था, जबकि शिवकुमार को मात्र 3 फीसदी समर्थन दिखाया गया था। 
इधर खबर है कि सिद्धारमैया और शिवकुमार दोनों को आज दिल्ली बुलाया गया था। सिद्धारमैया तो पहले से दिल्ली में हैं, लेकिर शिवकुमार ने "खराब स्वास्थ्य" के कारण बेंगलुरु छोड़ने में असमर्थता व्यक्त की। कुछ पर्यवेक्षक इसे शिवकुमार की नाराजगी बता रहे हैं।  हालांकि, शिवकुमार ने कहा कि वह 'प्रेजेंस ऑफ माइंड' वाले व्यक्ति हैं और उनकी कांग्रेस छोड़ने की कोई योजना नहीं है।
इधर, एआईसीसी इस पहलू पर भी मंथन कर रही है कि यदि सिद्धारमैया को सीएम बनाया जाता है तो शिवकुमार के लिये भी एक शक्तिशाली पद दिया जाना चाहिए। उन्‍हें कैबिनेट में कई महत्वपूर्ण विभाग दिए जा सकते हैं। सूत्रों ने कहा कि शपथ ग्रहण 18 मई को हो सकता है और सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री घोषित करने की औपचारिक घोषणा जल्‍द की जा सकती है।
हालांकि यह नहीं भुलाया जा सकता है कि दोनों शीर्ष नेता दो प्रतिद्वंद्वी गुटों का नेतृत्‍व करते रहे हैं। यह अलग बात है कि विधानसभा चुनाव को मद्देनजर उन्‍होंने एकजूटना का प्रदर्शन करते हुए कांग्रेस को भारी जीत दिलवायी।

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